ये खेल सदियों पुराना है । लेकिन बीते दशक से इस खेल में रवानीगी आई है । चमक बढ़ी है....दौलत बढ़ी है। खास बात, ये खेल पर्दे के पीछे से खेला जाता है। टेबल के नीचे से अंजाम दिया जाता है। मेहनत और ईमानदारी इससे दूर भागती है। बेगैरत और फरेब इसका संविधान है। चलिए, तो पर्दे के पीछे खेले जाने वाले इस खेल से पर्दा उठा ही देते हैं । जी हां हम बात कर रहे हैं देश में बढ़ रहे भ्रष्टाटाचार और रिश्वतखोरी की। हमारे देश में भ्रष्टाचार गरीब के हिस्से को डकार जाता है। और रिश्वतखोरी उस हिस्से को विधिसम्मत बना देता है। अब सवाल ये है कि लोकतंत्र को खोखला करने वाली इन दोनों बीमारियों को पनाह कौन देता है। ..जाहिर है आपके दिमाग में अलग-अलग शख्सियतों की तस्वीर उभरेगीं। .उनमें नौकरशाह भी होंगे और आपके जनप्रतिनिधी भी। .समस्या की गंभीरता का अंदाजा लगाइए। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को कहना पड़ गया था, रुपये का मात्र पंद्रह पैसे ही आम आदमी तक पहुंच पाता है। .ये कहना गलत नहीं होगा कि हमारा देश भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। .चारा घोटाला से लेकर कफन घोटाला तक, भूसा घोटाला से लेकर खाद घोटाला तक। लेकिन ये उदाहरण पुराने पड़ चुके हैं। जमाना बदल चुका है। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के तरीके भी बदल गए.। अब इसकी कोख से अखंड प्रताप सिंह, नीरा यादव, अरविंद जोशी और टीनू जोशी जैसे नौकरशाह पैदा होते हैं। अपने ही देश को खोखला करने वाले रविइंदर सिंह जैसे गद्दार पैदा लेते हैं। जनता की गाढ़ी कमाई लूटने वाले ए राजा पैदा होते है। खेल में खेल करने वाले कालमाडी पैदा होते हैं। अब घोटाला नहीं महाघोटाला होता है। कॉमनवेल्थ महाघोटाला, टूजी स्पेक्ट्रम महाघोटाला, लवासा महाघोटाला, आदर्श सोसायटी महाघोटाला, खाद्यान्न महाघोटाला, आवास ऋण घोटाला। करो तो कुछ बड़ा करो, शायद यही भ्रष्टाचारियों का टैग लाइन है। अब बात जरा इससे हटकर। 9 दिसंबर को पूरी दुनिया ने विश्व भ्रष्टाचार निरोधक दिवस मनाया। इस मौके पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट आती है, उसमें भारत को दुनिया के सबसे ज्यादा भ्रष्ट देश करार दिया गया है। खास बात ये कि हमारे नेता इसमें सबसे आगे हैं.। इसके बाद नौकरशाह का नंबर आता है, जिसमें पुलिस भी शामिल है। और आखिर में भ्रष्टाचार की हद पर मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी की टिप्पणी- आखिर अदालत से क्यों छूट जाते हैं चुनाव लड़ने वाले अपराधी...और जीवन भर क्यों सड़ते रह जाते हैं हमारे देश में मौजूद ढाई करोड़ कैदी। www.facebook.com
Monday, December 13, 2010
Monday, June 28, 2010
सिब्बल की अनोखी पहल
आजादी सपनों की...आजादी सोचने की...आजादी बोलने की...और आजादी लिखने की....तो फिर पढ़ने की आजादी क्यों नहीं....पढ़ाई क्यों है सब्जेक्ट्स के गुलाम....सब्जेक्ट्स में क्यूं बंटा है स्ट्रीम....और फिर, मुझे केमिस्ट्री के साथ हिंदी पढ़ना पसंद है तो क्यों कतर दिए जाते हैं मेरी पसंद के पंख....क्यों चढ़ा दी जाती है मेरी पसंदों की बलि....क्यों कर दिए जाते हैं मजबूर...नापसंद को भी पसंद बनाने के लिए.....ये कुछ सवाल है...सवाल में दम है...और सवाल में ही सवाल है...सवाल आजादी का है...सवाल अपनी अपनी पसंद का है...सवाल अपने अपने इंटरेस्ट का है....माना इंजीनियर बनने के लिए फिजिक्स कैमिस्ट्री के साथ मैथेमैटिक्स की पढ़ाई बेहद जरूरी है....पर सच्चाई ये भी है कि सुकून के लिए साहित्य भी उतना ही जरूरी है....जहां बात नापसंदगी की हो तो छींके तो आएगी ही....जोर जबरदस्ती से इंजीनियर तो बनाया जा सकता है....पर नापसंदी के कांटे भी जीवन भर चुभते रहते हैं....सब्जेक्ट्स कहीं बोझ ना बन जाए...इसलिए समय के साथ बदलाव भी जरूरी है...वाकई मानव संसाधन मंत्रालय की पहल अनोखी है..मानव संसाधन विकास मंत्रालय दसवीं पास छात्रों को आर्ट्स, कॉमर्स और साइंस के विषयों को एक साथ अपनाने की छूट देने पर विचार कर रहा है। इस संबंध में मंत्रालय ने स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के संयुक्त सचिव एससी कुंतिया की अध्यक्षता में दस सदस्यों की एक समिति भी बनाई है। समिति गठित की है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के अध्यक्ष विनीत जोशी को समिति का संयोजक बनाया गया। यह समिति हायर सेकंडरी और ग्रेजुएट स्तर पर छात्रों को विभिन्न क्षेत्रों के विषय लेने की अनुमति देने के संबंध में अपना सुझाव देगी..यह समिति विभिन्न बोर्ड से उत्तीर्ण हुए छात्रों की तुलना करने की प्रक्रिया के बारे में भी सुझाव देगी। मामले में, विशेषज्ञों का मानना है कि इस पद्धति को लागू करने पर विद्यार्थियों के मूल्यांकन और विभिन्न बोडरें की परीक्षा प्रणाली में काफी विसंगतियां हैं। ऐसे में यह समिति विभिन्न बोर्ड की परीक्षा प्रणाली का अध्ययन करेगी फिर अंतर बोर्ड के तुलनीय परिणामों की प्रक्रिया के बारे में सुझाव देगी। .इतिहास और वर्तमान दोनों को एक साथ पलटने की तैयारी चल रही है...समिति गठित कर दी गई है...इंतजार है तो बस समिति के आए रिपोर्ट्स का...जो कि सितंबर तक आने की उम्मीद जताई जा रही है....समय सीमा भी वही तय की गई है....निश्चित ही कपिल सिब्बल की प्रयास सराहनीय है....उम्मीद है कि वो भी जल्द आ जाएगी....और मंत्रालय की सोच आकार भी ले लेगी....तो तैयार रहिए साइंस, कॉमर्स और आर्ट्स का एक साथ मजा उठाने के लिए
Saturday, June 26, 2010
ये पब्लिक है...सब जानती है
विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए..शनिवार की सुबह जब आंखे खुली तो अखबारों में सबसे पहले इसी विज्ञापन पर नजर जा ठहरी...तेल की कीमतों में आग लगाने के बाद अब सरकार लोगों से सहयोग मांग रही है....इस विज्ञापन में पड़ोसी देशों का आंकड़ा पेश कर देश के आम आदमी को आईना दिखाने की कोशिश की गई है....पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से जारी इस विज्ञापन में सरकार खुद को बचाती नजर आई...हवाला दिया गया पड़ोसी देशों का...और ये भी कि कीमते बढ़ने के बावजूद एलपीजी पर 225 रुपये और मिट्टी तेल पर 16 रुपये की सब्सिडी दी जा रही है.... ये दिखाने की कोशिश की गई है कि देश में एलपीजी और केरोसीन की कीमत पड़ोसी देशों के मुकाबले काफी कम है....पड़ोसी देशों के मुकाबले यहां एलपीजी और मिट्टी तेल की कीमत कुछ भी नहीं....पर ये पूरा सच नहीं है....इस विज्ञापन में पेट्रोल और डीजल की कीमतों के बारे में कहीं भी जिक्र नहीं......क्योंकि सरकार को भी पता है कि पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देश में...भले ही एलपीजी और केरोसिन की कीमते भारत के मुकाबले ज्यादा हो...लेकिन पेट्रोल और डीजल की कीमतें वहां काफी कम हैं..भारत में जहां पेट्रोल की कीमत बढ़कर 51.43 रुपए प्रति लीटर हो गई है...वहीं पाकिस्तान में मौजूदा कीमत 39.70 और श्रीलंका में 25.76 रुपये प्रति लीटर है....यानी कि भारत में पेट्रोल-डीजल की मौजूदा कीमत पाकिस्तान और नेपाल से काफी ज्यादा है....सरकार इसी बात को साफ छुपा गई है...ताकि लोगों को लगे कि उसने पेट्रो पदार्थों की कीमतों में इजाफा कर कोई गुनाह नहीं किया है...सवाल ये है कि जब पाकिस्तान और नेपाल जैसे देश इतनी कम कीमत पर लोगों को पेट्रोल-डीजल मुहैया करा रहे हैं तो फिर भारत क्यों नहीं...जिस अर्थव्यवस्था को बचाने की दुहाई दी जा रही है...क्या वो हमारे पड़ोसी देशों से भी कमजोर हो गई है....जाहिर है कहीं ना कहीं सरकार की नीति में ही खोट है....हमारी तो यही गुजारिश है कि आम आदमी के साथ रहने का दावा करने वाली यूपीए सरकार कम से कम जनता को तो बेवकूफ नहीं बनाए...क्योंकि ये पब्लिक सब जानती है
Wednesday, May 12, 2010
सुष्मिता भी एक मां हैं...
सिने तारिका सुष्मिता सेन के नाम से भला कौन नहीं वाकिफ है। जी हां वही सुष्मिता सेन, जिन्होंने 1994 में मिस यूनिवर्स का खिताब जीत कर देश का नाम रोशन किया। इसके बाद ही उनका बॉलीवुड से नाता जुड़ा। भले ही फिल्मों में वो कोई खास मुकाम हासिल नहीं कर पाई। लेकिन लोग उन्हें..उनकी स्टारडम की वजह से कम। नेकनियती की वजह से ज्यादा जानते हैं.। खूबसूरत सुष्मिता की सौंदर्य में उस समय़ और इजाफा हो गया, जब साल 2001 के दौरान उन्होंने अनाथालय में पल रही एक नन्नी सी जान को गोद लेकर सारी दुनिया के लिए एक मिसाल कायम किया। उन्होंने साबित कर दिखाया था कि मां वहीं नहीं होती जो जन्म देती है। बल्कि वो भी है जिनके दिल में मां का मर्म छिपा होता है.। पर ये उनके लिए ये फैसला आसान नहीं रहा होगा। अपने करियर के साथ-साथ अपनी भावी शादीशुदा जिंदगी की तस्वीर भी उनके जेहन में रही होगी, लेकिन उन्होंने इसकी कोई परवाह नहीं की। अपनी गोद ली हुई बेटी रिनी को बिल्कुल अपने कलेजे के टुकड़े की तरह ही पाला। यानी रील लाइफ में मां को रोल भले ही कैसे भी निभाया हो। रियल लाइफ में सुष ने ये किरदार बखूबी निभाया है। रिनी अब दस साल की हो गई है, सुष ने रिनी को भले ही अपने गर्भ से जन्म नहीं दिया लेकिन उसकी शक्लोसूरत बिल्कुल सुष्मिता की तरह मिलती है। सुष्मिता की मां कहती है...बचपन में सुष्मिता बिल्कुल ऐसी ही लगती थीं... यह सचमुच ताज्जुब की बात है । बहरहाल गोद लेने के साहसी काम के लिए सुष्मिता बधाई की पात्र हैं। वो रिनी को हर साल छुट्टियों में विदेश ले जाती हैं और अच्छी मां साबित हो रहीं हैं। सुष्मिता का बेटियों से प्यार यहीं नही खत्म हुआ, अब वो 34 साल की हो चुकी है, शादी भी नहीं की हैं, लेकिन उनका ममत्व एक बार फिर कुलांचे मारने लगा और वो दूसरी बेटी आलिशा को गोद लेने के लिए कोर्ट में अर्जी लगा दी। कोर्ट ने उनके हक में फैसला दिया और आज 8 महीने की आलिशा के साथ वो बहुत खुश है। सुष्मिता कहती हैं...कोर्ट में मेरे कुछ भी आसान नहीं था। क्योंकि मै अकेली अभिभावक थी और सेलिब्रिटी भी और ये सब मेरे हक में नहीं था। रिनी की तरह आलिशा को गोद लेने का निर्णय भी उनका खुद का बोल्ड फैसला था। उन्होंने साबित कर दिया कि मां बनने के लिए किसी शख्स से शादी करना ही जरूरी नहीं। सारी इंडस्ट्री में सुष ने एक शानदार मिसाल पेश की है और आज वो खुश है अपनी दोनों बेटियों के साथ...पर रिनी और आलिशा के लिए मदर्स डे तो ताजिंदगी होगी
मां तु बहुत याद आ रही...
मां मुझे तुम बहुत याद आती हो....मां जब मैने इस दुनिया में कदम रखा तो तेरी सोंधी खुशबू में जैसे समाता चला गया.....मुझे उसी वक्त अहसास हो गया था मां...कि तू ही मेरे लिए भगवान है...तू ही मेरे लिए सब कुछ है....तेरे आंचल की ठंडी छाव में मैं रोना भूल गया था....तूने ही तो मुझे अपने सीने से लिपटाकर एक खूबसूरत रिश्ते का अहसास दिलाया था....मेरी मां....मैने जब बोलना सीखा था तो पहली बार मेरे मुंह से जो आवाज निकली थी वो मां थी....मां...मैं जब अपनी तोतली जुबान में तुझे पुकारता...तो तू खिलखिलाकर कितना हंसती थी....मुझ पर दुनिया का सारा लाड़ प्यार उड़ेल देती थी...मां... तूझे तो याद होगा...कि मैने तेरी उंगलियां पकड़कर कैसे चलना सीखा था....पर हां जब मेरे नन्हें कदम तेरी ओर बढ़ते थे... तो अपना सारा काम छोड़कर मुझ ओर दौड़ पड़ती थी....और बड़े ही प्यार से मुझे गोद में उठा लेती ...याद है मां...जब मुझे पहली बार स्कूल भेज रही थी....तब तू कितना रोयी थी....जैसे लगता था कि मैं तूझे हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर कहीं दूर जा रहा था....तूझसे तो एक पल की जुदाई नहीं सहा जा रहा था...पर कुछ पल के लिए ही सही...अपने दिल पर पत्थर रखकर तूने मुझे अपने से दूर किया था....आज मैं बड़ा हो गया हूं मां...मैने अपने पैरों पर चलना बखूबी सीख लिया है...मैंने तो दुनिया की हर झोंकों को सहना भी सीख लिया है....मुझे याद है मां....मैं जब पहली बार तूझसे दूर गया...तो ऐसा लगा कि तेरा संसार ही उजड़ा जा रहा ....मैं यहां दूर देस में खूब रोया थी मां....पर, वहां तेरा आंचल भीगा...तू रात को सोती सोती उठ बैठती ..तो .लब पर बस मेरा ही नाम रहता ....ये कैसा प्यार तेरा है मां......जब भी मैं ठोकर खाती था, मां तूने ही तो मुझे उठाया ...थक कर हार नहीं मानू ये तूने ही समझाया है....मैं जानता हूं मां तेरी सुबह मेरी राहें तकते हुए शुरु होती है...और शाम मेरे इंतजार में खत्म हो जाती है...मां तू तो अपने सपने भूलकर मेरे सपने को ही जीती हो...होठों से मुस्कराती हो..विरह के आंसू पीती हो....पर क्या करूं मेरी मां...मै तो मजबूर हूं....पर आज भी समझने की कोशिश करता हूं...मां तेरा ये कैसा प्यार है....आज भी जब मुझे नींद आती नहीं, गिन के तारे जब कटती हैं रातें मेरी। दर्द मेरा जब कोई समझता नहीं, याद आती है माँ बस तेरी-बस तेरी। मां तू बहुत याद आ रही...बहुत याद
Thursday, December 31, 2009
२०१० में भारत की सुरक्षा तैयारियां और चुनौतियां
आकाश में सुखोई, धरती पर अग्नि और समुद्र में अरिहंत, ये है उभरते भारत की सामरिक ताकत की नई पहचान। इसी पहचान के जरिए आज भारत दुनिया के उन देशों की कतार में खड़ा है जिन्हें विश्वशक्ति का खिताब हासिल है। लेकिन ये तो महज शुरुआत भर है चुनौतियां अभी कई हैं। भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दौर के बीच खुद को सबसे बेहतर साबित करने की चुनौती। आर्थिक विकास के साथ-साथ समग्र रक्षा विकास की चुनौती और दुश्मन के आक्रमक इरादों को नेस्तनोबूद करने की चुनौती। ये तो सबको पता है कि पूरी दुनिया की सुरक्षा जरूरतें तेजी से बदल रही हैं। खासकर दक्षिण एशिया में संघर्ष का तरीका तो पूरी तरह बदल चुका है। एक तरफ पाकिस्तान आतंकवाद की आग में जल रहा है तो दूसरी तरफ अफगनिस्तान में शांति बहाल करना अमेरिका के लिए टेढ़ी-खीर साबित हो रहा है। कुछ ऐसा ही हाल भारत के दूसरे पड़ोसी देशों का भी है। श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश की भी अपनी अपनी मुसीबते हैं, समय-समय पर सिर उठाती भारत विरोधी ताकतें सुरक्षा की चिंताएं बढ़ा रही है। पिछले साल पड़ोसी देश चीन ने जिस तरह से अपनी 60वीं वर्षगांठ पर शक्ति प्रदर्शन किया। उससे भारत को एक नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया। इससे पहले ही चीन, लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक करीब चार हजार किलोमीटर लंबी, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना के लिए मुश्किलें पैदा करने लगा है। जाहिर है इन सबके बीच भारतीय सेनाओं की महत्वकांक्षा भी बढ़ती नजर आई। बात क्रांतिकारी बदलाव की होने लगी, सुरक्षा तैयारियों में तकनीक का प्रभाव की मांग होने लगी, जैसे देश की राजनीतिक और नौकरशाही दोनों की नींद खुल गई। सुरक्षा तैयारियों को और मजबूत बनाने के लिए बात होने लगी। यही वजह है कि सशस्त्र सेनाओं को नए साजोसामान मुहैया कराने की कई महत्वकांक्षी योजनाएं शुरु की गई है, लेकिन ये योजनाएं सरकारी कार्यप्रणाली की शिकंजे में फंसी हुई है...नौकरशाही की जबड़े में फंसकर कुछ योजनाएं तो दम तोड़ चुकी है और कुछ कछुआ चाल में रेंगने को मजबूर है। इस साल भी बोफोर्स दलाली की वजह से दो दशकों से रुकी पड़ी होवित्जर तोप मिलने की उम्मीद भी ना के बराबर है, सेना को होवित्जर तोप के साथ ही लाइट और मीडियम हेलिकॉप्टर तो चाहिए ही, इसके अलावा पैदल जवानों के लिए एसॉल्ट रायफल और दूसरे साजोसामान की जरुरते पूरा करना, सैन्य अधिकारियों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है...हालत ये है कि न तो वायुसेना को जरूरी 126 लड़ाकू विमान मिल पा रहे हैं, और ना ही नौसेना अपनी जरुरतों के मुताबिक खुद को तैयार कर पा रही है। नौसेना को ये उम्मीद जरुर है कि नए साल के दौरान रुस से परमाणु पनडुब्बी नेरपा मिल जाएगी...साथ ही कुछ स्टील्थ फिग्रेट और विध्वंसक पोत भी मिलने की उम्मीद की जा रही है, नौसेना को घोषित योजनाओं के मुताबिक समुद्री तटीय विमान और तटीय सुरक्षा को और चाक चौबंद करने की जरुरत है, पड़ोसी देश में बैलास्टिक मिसाइलों की बढ़ती तैनाती भी चिंता की बात है। दुश्मन की मिसाइलों से बचाव के लिए एंटी मिसाइल सिस्टम की जरुरत तेजी के साथ महसूस की जा रही है, लेकिन देश को रक्षा शोध संस्थान में विकसित किए जा रहे एंटी मिसाइल सिस्टम का अब तक परीक्षण ही पूरा नहीं हो पाए है। दूसरी ओर पिछले कुछ साल में भारत विश्व बाजार में हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार बन कर उभरा है, इस दौरान उसने अपने सामरिक नजरिए को भी पूरी तरह बदल लिया। इसी के चलते अब वो परंपरागत हथियार खरीदने के बजाए हवा में ही विमान में ईंधन भरने की तकनीक और लंबी दूरी की मिसाइलें तक खरीद रहा है....लेकिन सच डरावना है, अभी भी हमारी सुरक्षा तैयारिंया काफी ढीली ढाली है,ग्यारहवीं रक्षा योजना को बने हुए तीन साल पूरे हो चुके हैं,लेकिन सरकार अभी तक इसे अंतिम रुप नहीं दे पाई है। रक्षा खरीद प्रणाली भी अभी तक अस्त व्यस्त है.। 2010 में उन प्रणालियों को और ज्यादा मजबूत करना यूपीए सरकार के लिए खासी चुनौती भरी होगी, तुलनात्मक रुप से देखा जाए तो एक और अपनी सुरक्षा बेड़े को मजबूत करने के लिए दुनिया का हर देश अपनी रक्षा बजट को दुगुना तीगुना कर रहे हैं....वहीं भारत अपनी कुल जीडीपी का महज 2 फीसदी ही रक्षा बजट पर खर्च करता है, जबकि चीन 7 और पाकिस्तान का रक्षा बजट पांच फीसदी है। अगर यही हाल रहा तो चीन की बात तो दूर हम पाकिस्तान के मुकाबले भी खड़े नहीं रह पाएंगे...साथ ही हाई टेक्नॉलोजी वाले हथियारों की खरीद और सशस्त्र सेनाओं की आधुनिकरण भरपूर बजट के बिना उम्मीद करना बेमानी है।
Saturday, November 21, 2009
चंदा मामा बिकने को तैयार है...जी हॉ चंदा मामा इज फार सेल । अगर आप भी किसी को प्यार करते है और अपने प्रेमी या प्रेमिका को कोइ गिफ्ट देना चाहते है तो आप उन्हे दे सकते है चंदा मामा...बस ये गिफ्ट थोड़ा मंहगा जरुर होगा । मगर मिलेगा जरुर इस बात की पक्की गारंटी दे रही है साइट www.moonforsale.com । इस साइट पर जाकर आप मन मर्जी को प्लोट खरीद सकते है । इस साइट की माने तो आप चांद पर अपना आशियां बना सकते है । सिर्फ यही नही आप चांद पर ज़मीन खरीद किसी को भी गिफ्त कर सकते है फिर वो चाहे आपकी पत्नी हो , बच्चे हो , माता -पिता या फिर आपकी प्रेमिका । इस साइट का दावा है कि चांद पर जमीन बेचने का हक उसे ही है और चांद पर कई प्लोट बिकाऊ है । 9 करोड़ एकड़ की प्रोपटी चांद पर है । जिसमे से फिलहाल 2प्रतिश ही आम लोगो के लिए बिकाउ है । साथ ही चांद पर हर तरह का प्लाट उपलब्ध है जिसकी शुरुआत एक एकड से होगी । अब आपके मन में ये बात कौंध रही होगी कि ये प्लाट कितने के है तो हम बताते हैं इस प्लाट की शुरुआती कीमत 18 डॉलर रखी गई है । पॉश इलाके में जमीन की कीमत थोड़ी महंगी ऱखी गई है...अगर प्लाट लेक ऑफ ड्रीम के पास जमीन खरीदनी है तो जेब थोडी ढीली करनी होगी क्योंकि यहा 1 अकड जमीन 34 डॉलर की है । यानि मात्र 18डॉलर देकर आप 1एकड जमीन के मालिक हो जायेंगे । आपको ये जान कर हैरानी होगी की अब तक 4.50 लाख से ज्यादा लोग चांद पर अपना आशिंया बना चुके है...इस साइट से अपना प्लॉट तो खरीद लेंगे मगर चांद पर जाने के लिए आपको इस साइट से कोई मदद नहीं मिलेगी...यानी चांद पर जाने का खर्चा आप खुद उठाएगा...अब भला करोड़ों रुपये खर्च कर चांद पर जाने से रहे...
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