Saturday, May 14, 2011

वो पांच भूले

पश्चिम बंगाल...देश का एक ऐसा राज्य जो 34 सालों से एक पार्टीतंत्र के कब्जे में रहा...34 सालों से गरीबी, हिंसा और कुशासन से जूझता रहा....लेकिन इस प्रदेश में भी बदलाव का सूरज निकल ही आया। .या यूं कहिए कि लोगों ने जिन सपनों को मरा हुआ मान लिया था...अब वे सपने कुलांचे मारने लगे है....लेकिन बड़ा सवाल ये है कि ये .जीत किसकी है...राज्य की जनता की...ममता के जादू की...या फिर एक पार्टीतंत्र के खात्मे की.....आज भले ही ममता अपनी जीत पर इतरा रही हों....लेकिन इसके पीछे ना तो उनकी दहाड़,  ना जिद और ना ही उनका कोई करिश्मा है....बल्कि इसके पीछे लेफ्ट के वे 34 साल हैं....जिसने बंगाल को हाशिये पर ला खड़ा किया..इसलिए अगर वे अपनी जीत के लिए किसी को शुक्रिया अदा करती हैं...तो सबसे पहले लेफ्ट का शुक्रिया अदा करें ...दरअसल माकपा ने अपनी 34 साल की इस जिंदगी में एक नहीं कई बुनियादी भूलें की...पहली भूल, राज्य में पार्टी और प्रशासन के बीच भेद का खात्मा...जिसके तहत प्रशासन के नियम कायदे की जगह पार्टी के आदेशों ने ले लिया....दूसरी भूल संस्थाओं और क्लबों के जरिए सामाजिक नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश...इसे दूसरे नजरिए से देखें तो पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी में बड़े स्तर पर दखलअंदाजी की...तीसरी भूल,  अपराधियों को खुली छूट देना. और उन्हें पार्टी के लिए अवैध वसूली जैसे कामों में लगाना....चौथी भूल नाकाबिल नेताओं के हाथ में पार्टी की कमान देना, मसलन जिन्हें मार्क्सवाद का ज्ञान नहीं, भाषा की जानकारी नहीं उन्हें भी पार्टी के अखबार, पत्रिकाएँ और टीवी चैनल चलाने का हक दे दिया गया...और तो और जिस विधायक या सांसद की साख पर बट्टा लगा...उन्हें भी अपने पद पर बिठाए रखा गया....और आखिर में पांचवी भूल है राज्य प्रशासन का मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति अनदेखी...इसका नतीजा ये हुआ कि लोग अपनी ही अस्मिता और अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष करने लगे....राज्य में जिस तरह से औद्योगिकरण का अंत हुआ....उससे बेरोजगारी बढ़ी, गरीबी उफान पर आ गई....वाममोर्चा की जमीन अधिग्रहण नीति ने लोगों को पार्टी के खिलाफ नजरिया ही बदल दिया... जो सिंगुर और नंदीग्राम में हुआ...उसकी उम्मीद वहां के लोगों को भी नहीं थी....और यही लेफ्ट के ताबूत में अंतिम कील साबित हुई....ममता ने इस मुद्दे को जिस तरह से भुनाया उससे लोगों का भरपूर का समर्थन उन्हें मिला..वो बंगाल की किस्मत बदलने के लिए काफी था...यानी बुद्धदेव भट्टाचार्य के 11 साल और उनकी पार्टी के 34 साल का राज खत्म हो गया...वामपंथियों ने इन 34 सालों में क्या खोया इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बुद्धदेब भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। 

Friday, April 15, 2011

ये दिल्ली है साहेब !

ये दिल्ली है साहेब....यहां चकाचौंध है....आसमान छूती बिल्डिंगें हैं....बड़ी बड़ी कंपनियों के साइनबोर्ड है...सड़क पर दौड़ती गाड़ियां हैं...और....नेताओं के सफेद खद्दर है...लेकिन दिनकर कहते हैं कि यमुना कछार पर बैठी विधवा दिल्ली रोती है....मुगलों की सरपरस्ती के लिए नहीं....इस शहर के अदद रहनुमाओं के लिए....लेकिन कौन समझाए उन्हें....आज की दिल्ली बदल गई है....अब ये दिल्ली सफेद खद्दरवालों की कहलाती है....इसमें अफसोस नहीं, खुशी है...शहर के रहनुमा मिल गए हैं....सिर्फ रहम मिलना बाकी है.....मशहूर कवि जौक को भी बड़ा गुमान था अपनी दिल्ली और दिल्ली की गलियों पर...कह गए...कौन जाए जौक, दिल्ली की ये गलियां छोड़कर....जौक नहीं गए...यहीं रह गए....इन्हीं तंग गलियों में जिंदगी की खुशबू तलाशते....पर अब जौक का जमाना नहीं है...तंग गलियों में खुशबू नहीं बदबू मिलती है....गंदगी मिलती है...गलियों से निकलें तो टूटी सड़कें मिलती है.....हां ये दिल्ली है साहेब....अब इन गलियों में बेबस और मजबूर इंसानियत रहती है....जो हरदम टकटकी लगाए रहती है रहनुमाओं पर...थोड़ी सी रहम की तलाश में....लेकिन रहम के नाम पर आश्वासन मिलता है...कोरे वायदे और झूठे आश्वासन....इसमें रहनुमाओं की नहीं...सफेद खद्दर का दोष है साहेब...जिसमें इंसान समाते ही कब संगदिल बन जाता है...उसे पता ही नहीं चलता....उसे ना तो आंखों से दिखाई पड़ता है और ना कानों से सुनाई ही पड़ता है....इंसानियत पुकारती है....आओ देखो...थोड़ा करीब से देखो....देखो जौक की इस दिल्ली को...देखो दिल्ली की सूरते हाल को....देखो टूटी फूटी इन सड़कों को...देखो सड़कों पर लगे कूड़े के अंबार को.....और महसूस करो नाक में छेद कर देने वाली इससे निकल रही दुर्गंध को....लेकिन उन्हें पता है कि हमारे रहनुमा बहरे हैं और सावन के अंधे भी...उन्हें तो सब तरफ हरा ही हरा दिखाई प़ड़ता है....चिल्लाने से कुछ फायदा नहीं

बेरुखी की ऊंची दीवारें

महानगरों की चकाचौंध के बीच सबकुछ ठीक ठाक नहीं है....या यूं कहिए कि जिस तरह रिश्तों में दूराव पैदा होने लगी है....उस तरह से कई जिंदगियां बेबस और गुमानामी की काल कोठरी में कैद होती जा रही है....नोएडा की अनुराधा और सोनाली भी महानगरों में फैलते अंधेरे की एक कड़वी हकीकत है....देश की राजधानी दिल्ली ने इससे पहले भी तन्हाई की डंक से तिल तिल कर मरती कई जिंदगियों को देखा है....एक दूसरे से जुदा हो जाने का खौफ हो...या फिर किसी अपने को खो जाने का गम....हर बार उन जिंदगियों को काल कोठरी में कैद कर जाती है...लेकिन अचरज तो तब होती है कि जब समाज भी उस भयानक तस्वीर को देखने के बाद कोई सबक नहीं लेता....चलिए सोनाली और अनुराधा के बहाने ही सही...दिनकर के शब्दों में वैभव कि दिवानी दिल्ली के सभ्य समाज की कुछ भयानक तस्वीर पर नजर डाल लेते हैं.... अगस्त 2007 में दिल्ली के कालकाजी इलाके में भूख और गुमनामी की मारी तीन बहनें...जिनमें से एक ने दम तोड़ दिया....माता-पिता की मौत के बाद इन तीनों ने खुद को अंधेरी कोठरी में कैद कर लिया था....डॉली, पूनम और नीरू नाम की ये तीनों बहनें कई बरसों से एक वक्त के खाने पर गुजारा कर रही थी....एक दिन ऐसा भी आया कि जब उनके पास खाने के लिए नमक पानी और चीनी से ज्यादा कुछ नहीं रह गया....नीरु एक दिन भूख सह नहीं सकी...और चल बसी....लेकिन बाकी दोनों बहनों ने उसकी लाश को कमरे में ही रहने दिया...उस घर में वे तब तक रही जब तक कि पड़ोस को उस घर से तेज बदबू नहीं आने लगी...सबसे बड़ी बात तीनों बहने पढ़ी लिखी थी...और उनमें से दो ने नौकरी भी की थी...इसके ठीक दो महीने बाद यानी अक्टूबर 2007 में दिल्ली के पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश की एक कोठी से आ रही तेज दुर्गंध ने पड़ोसियों को परेशान कर दिया....पुलिस को खबर मिलने के बाद कोठी का दरवाजा तोड़ा गया तो उसमें करोड़पति मनिंदर सिंह भंडर की सड़ी गली लाश पाई गई....कमरे में अंधेरा फैला था..खाने का कोई सामान घर में नहीं मिला....पड़ोसियों ने बताया कि मनिंदर सिंह किसी से बात नहीं करते थे....मां की मौत के बाद मनिंदर को गहरे डिप्रेशन ने आ घेरा था...उम्मीद जताई गई कि मनिंदर को तन्हाई और खौफ ने मार डाला....इसी तरह सितंबर 2010 में पुलिस ने साकेत के एक फ्लैट से एक ऐसी महिला को बाहर निकाला...जो 30 दिन से अपनी मां की लाश के साथ कमरे में बंद थी....यहां तक कि उसे ये भी पता नहीं था कि उसकी मां मर चुकी है.....शालिनी मेहरा नाम की ये महिला तलाकशुदा थी...और अपनी मां के साथ ही उस फ्लैट में रह रही थी...यानी कि अकेलेपन ने शालिनी को गहरे अवसाद में डाल दिया था...बहरहाल ये चारों घटनाएं इस शहर के उन अंधेरे कोनों को दिखाने के लिए काफी है...जहां लोगों की निगाह भी नहीं पड़ती....इन चारों घटनाओं में एक ही बात सामने निकलकर आ रही है....और वो है अकेलापन का अहसास और अपनों के खोने का गम...लेकिन समाज की बेरुखी भी कम नहीं रही...क्योंकि समाज ने उनसे रिश्ता ही नहीं रखा...उनकी सुध ही नहीं ली........ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या ये एक सभ्य समाज की नियती बन चुकी है कि हर शख्स अपने अपने अपने अंधेरे कोने में चुपचाप जिएं और मर जाए....क्या बेरुखी की दीवारें इतनी ऊंची हो चुकी है कि साथ रहने वाला मौत को पुकार रहा होता है और कोई सुनने वाला नहीं होता....बहरहाल,इंसानी रिश्तों की टूटती कड़ी को समेटने का कोई ना कोई रास्ता ढूंढना ही होगा

Wednesday, April 6, 2011

छोटे गांधी की जिद

अन्ना हजारे की जिंदगी उतार चढ़ावों से भरी हुई है....बेहद ही गरीब परिवार में जन्मे अन्ना ने देश को हमेशा नई राह दिखाने का काम किया है.....महाराष्ट्र के अपने पैतृक गांव की कायापलट करने के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ दी....आज वे देश को भ्रष्टाचार से निजात दिलाने के लिए कमर कस चुके हैं....भ्रष्चार को जड़ से मिटा देने का संकल्प लेने वाली इस बूढ़ी काया...और जिद्दी इंसान आज देश का सुपरहीरो बन चुका है । बड़े अड़ियल हैं ये छोटे गांधी...कोई लालच नहीं...कोई डर नहीं...मर भी जाएं तो कोई बात नहीं...लेकिन भ्रष्चाटाचार के खिलाफ उठी आवाज को मद्धम नहीं पड़ने देंगे...जन लोकपाल बिल से कम तो कुछ भी नहीं....कोई समझौता नहीं...कोई मरव्वत नहीं....जिद हो तो ऐसी...ऐसी जिद तो सिर्फ महात्मा गांधी में ही देखने को मिलती थी....जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंका था....आज वही जिद समाजसेवी अन्ना हजारे में भी देखने को मिल रही है.....लोकपाल बिल के लिए आमरन अनशन पर जा बैठे हैं अन्ना हजारे....15 जून 1938 को महाराष्ट्र में जन्मे अन्ना हजारे का असली नाम किशन बाबूराव हजारे है....बेहद ही गरीब परिवार में जन्मे अन्ना की जिंदगी की शुरुआत मुंबई के दादर स्टेशन पर फूल बेचने से शुरु होती है....लेकिन बचपन से ही महापुरुषों के विचारों पर चलने का शौक उन्हें आगे जाकर एक सामाजिक कार्यकर्ता बना देता है....परिवार का भरण पोषण की खातिर अन्ना 1960 में सेना में भर्ती हुए....1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौराव वे पंजाब में सेना के ट्रक ड्राइवर की हैसियत से तैनात हुए....लेकिन बदकिस्मती से पाकिस्तान ने हवाई हमला कर दिया...जिसमें अन्ना ने किसी तरह गाड़ी से कूदकर अपनी जान बचाई....इसके बाद 1975 में अन्ना ने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले लिया....यहीं से शुरु होती है अन्ना की सामाजिक जिंदगी....महाराष्ट्र के अहमदनगर के अपने पैतृक गांव रालेगांव सिद्धी में उन्होंने गांव वालों को सर्वांगीण विकास के लिए प्रेरित करना शुरु कर दिया....गांव के कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्होंने बेहतर सिंचाई व्यवस्था, वर्षा जल को रोकने के लिए नहरों की खुदाई और मिट्टी संरक्षण में महत्वूर्ण भूमिका निभाई....नतीजतन आर्थिक निर्भरता में उनका गांव देश का रोल मॉडल बन गया....इनके प्रयासों से पूरे इलाके में अनाज बैंकों की नींव रखी गई....शिक्षा, स्वास्थ्य, शराबबंदी और सामूहिक विवाह के जरिए अन्ना ने अपने पूरे इलाके की तकदीर ही बदल दी....इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए भारत सरकार ने अन्ना हजारे को 1992 में पद्म विभूषण से नवाजा....बाद में वे सूचना के अधिकार कानून से जुड़ गए...और उसके लिए काम करना शुरु कर दिया...जिसकी बदौलत आज हम इस कानून का इस्तेमाल कर रहे हैं....इससे पहले 1989 में उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी जनांदोलन का गठन किया...जो आज 27 जिलों के 222 ब्लॉक में फैला हुआ है....अन्ना की इस मुहिम का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि....उन्होंने महाराष्ट्र में पिछले आठ सालों के दौरान अन्ना 400 सरकारी अफसरों और 7 मंत्रियों को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया... अब अन्ना ने जनलोकपाल बिल लाने के लिए अपनी जिद ठान ली है....हौसले बुलंद है....और सुनहरे भारत की तस्वीर को करीब से निहारने की तमन्ना बाकी....मौत से पंगा लेने वाले इस बूढ़ी काया में जिद को अगर करीब से देखनी हो तो चले आइए दिल्ली के जंतर मंतर...देखिए कैसे इस हाड़ मांस की काया ने सरकार को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है

Friday, March 25, 2011

लैपटॉप लो, वोट दो

लगभग ढाई हजार साल पहले ग्रीक फिलॉस्फर अरस्तू ने आशंका जाहिर की थी कि लोकतंत्र भीड़तंत्र में तब्दील हो सकता है....राजनेता लोगों को लालच देकर बरगला सकते हैं...पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में ग्रीक फिलॉस्फर की आशंका सही साबित होती दिख रही है.....अगर आप तमिनाडु के या फिर केरल के मतदाता हैं...तो ये दिल मांगे मोर कहने से कतई गुरेज नहीं करेंगे...बात ही ऐसी है....क्योंकि इन राज्यों के राजनीतिक पार्टियों ने कहा है कि गिफ्ट लो और वोट दो...जी हां, वोट दो और नोट लो की बातें अब पुरानी पड़ गई है....इसलिए अब बात हो रही है वोट दो और लैपटॉप लो.....वोट दो और फ्रीज लो...वोट दो और मंगलसूत्र लो.....ये नए जमाने के लुभावने और चुनावी नारे हैं....मासूम जनता को छलने के लिए और ठगने के लिए ताजातरीन रिश्वत है....अब ये जनता की विवेक पर निर्भर है कि एक अदना सा वोट के बदले उसे क्या चाहिए....सड़क, बिजली और पानी का आश्वासन चाहिए या फिर ठंडा पानी पीने के लिए फ्रीज....पेट में अन्न का दाना भले ही नहीं हो....लेकिन उंगलियों को लैपटॉप पर घूमाने के लिए पूराका पूरा भरोसा....पीने के लिए नल से पानी नहीं आता हो...लेकिन चिंता की कोई बात नहीं....नेताजी अगर सत्ता में आ गए तो सबको मिलेगा मिनरल वाटर...कितने दिनों तक फिलहाल पता नहीं....चलिए अब आते हैं असली बात पर....चुनावी मौसम आ गया है...इसलिए नेताओं में भी गिरगिट की तरह रंग बदलने की होड़ सी मच गई है...महत्वकांक्षाएं दुबारा कुलांचे मारने लगी है... पांच साल तक सत्ता से चिपने रहने और भ्रष्टाचार में नाक तक डूबे रहने के सपने आंखों में तैरने लगे हैं....अगले महीने तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव है...इसलिए राजनीतिक पार्टियों के नए पैतरें शुरु हो चुके हैं....सबसे पहला दांव चला मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने....फिर से सत्ता को हासिल करने के लिए उन्होंने घोषणा की...अगर उनकी पार्टी सत्ता में लौटते हैं तो वे छात्रों को लैपटॉप मुफ्त में बाटेंगे.....महिलाओं के लिए भी चारा फेंकने में कोई हिल हुज्जत नहीं की....और उनको दिया जाएगा मुफ्त में मिक्सर ग्राइंडर...साथ में 35 किलो चावल फ्री....अब भला अम्मा यानी की जयललिता कहां चूकने वाली थी...सो उन्होंने भी अपना ट्रंप कार्ड फेंका....उनका पैंतरा अपने प्रतिद्वंद्वी करुणानिधि से थोड़ा सा दमदार था....उन्होंने महिलाओं का नब्ज पकड़ते हुए उनके लिए मंगलसूत्र और चालीस ग्राम सोना मुफ्त देने का वादा किया....बीपीएल परिवारों के लिए मिनरल वाटर, ग्यारहवीं और बारहवीं के छात्रों के लिए लैपटॉप और साथ ही गरीबों के लिए 20 किलो अनाज मुफ्त मुफ्त मुफ्त....अब जरा इस राज्य से इतर केरल पर नजर दौड़ाते हैं....लोकतंत्र का मजाक उड़ाने में यहां के राजनीतिक दल भी पीछे नहीं है....कांग्रेस नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंड ने चुनावी जीत होने पर 36 लाख नौकरियां, बीपीएल परिवारों के लिए एक रुपये प्रति किलो चावल और दसवीं के छात्रों के लिए मुफ्त में साइकिल देने का चारा फेंका है.....पश्चिम बंगाल में ममता अभी तक कांग्रेस से समझौते में लगी थीं....वो तो हो गया....अगर वो भी कोई नई तान छेड़ दें तो आश्चर्य नहीं....रही बात असम और पुडुचेरी की तो वहां का पूरा परिदृश्य ही अलग है...जरा सोचिए लोकतंत्र का इससे बड़ा भद्दा मजाक क्या हो सकता है....जहां जनता की वोट को बिकाउ करार दिया जाता है...जहां के कानून को ताक पर रखकर लोगों को रिश्वत खिलाई जा रही है...आखिर क्यों नहीं...एक बार रिश्वत खिलाओ...और पूरे पांच साल तक रिश्वत बटोरो...लोकतंत्र के इन पहरुओं के पास जनता की बुनियादी जरूरतों की कोई फिक्र नहीं है....फिक्र है तो सिर्फ और सिर्फ सत्ता से जन्म जन्मांतर तक चिपके रहने की...ताकि उनकी आने वाली कई पीढ़ियों का फ्यूचर संवारा जा सके....जनता जाए भाड़ में...काहे का जनता जनार्दन....काहे का लोकतंत्र

Saturday, March 5, 2011

ड्राइविंग सीट पर अदालत

इस देश में कितने गरीब...खाने के लिए दो वक्त की रोटी नहीं, तन ढकने के लिए कपड़े नहीं और सिर छुपाने के लिए छत नहीं....योजनाएं बनती है गरीबों के लिए, लेकिन तिजोरी भरती है अमीरों की...गरीब और भी गरीब....अमीर और भी अमीर, इतना अमीर कि उसे अपनी दौलत दौलत छुपाने के लिए देश में जगह कम पड़ जाती है...मजबूरन उसे अपनी दौलत विदेशों में रखनी पड़ती है....जहां उसपर किसी की भी नजर ना पड़े....और हमारे देश का कानून तो देखिए.....कानून कहता है, चोर की जगह सलाखों के पीछे होना चाहिए....होता भी है...बल्कि खूब होता है....कोई किसी का जेब तराश ले, तो सड़ो छह महीने जेल में...किसी का माल उड़ा लिए, तो सलाखों से कोई नहीं बचा पाएगा....और तो और, कोई आम आदमी सरकार के हजार दो हजार रुपये टैक्स चुरा लिये....तो उसे भी थमा दी जाती है कानूनी नोटिस, जुर्माना भरो....या फिर जाओ जेल में....आखिर क्यों नहीं अपराधी जो ठहरा....लेकिन जरा सोचिए....अगर किसी को हजार दो हजार के लिए जेल मिल सकती है....तो सरकार के हजारों करोड़ रुपये चुराने वालों का क्या हश्र होना चाहिए....अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है....लेकिन इस देश में ऐसा कुछ नहीं होता....कानून तो छोटे मोटे अपराधियों के लिए ही होता है....बड़े अपराधियों तक वो पहुंच ही पाता...अगर पहुंच भी जाता है, तो कानून का पालन कराने वाले उसका गिरेबान पकड़ने के बजाय, उसके आगे दुम हिलाते नजर आते हैं....यही हमारे देश की तकदीर है....यही हमारे देश की तस्वीर है....हम आपको मिलाते हैं एक ऐसे ही शख्सियत से....ये हैं हसन अली....सैयद मोहम्मद हसन अली खान....पुणे में स्टड फॉर्म चलाते हैं.... हवाला कारोबार और मनी लॉंडरिंग के जरिए अकूत दौलत बनाई...अरबो डॉलर विदेशी बैंकों में जमा किए...एक अनुमान के मुताबिक करीब 8 अरब डॉलर.....लेकिन देश में इन्होंने अपनी कमाई पर कोई टैक्स नहीं चुकाया....1999 से ही कोई टैक्स जमा नहीं की....देश का पैसा चुराकर विदेशों में रख दिया....लेकिन सरकार ने इनपर शिकंजा कसने की कतई जरूरत नहीं समझी.....सरकार की नींद खुली जब काले धन को लेकर हो हल्ला मचने लगा...इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और प्रवर्तन निदेशालय सक्रिय हुआ....हालांकि आयकर विभाग ने 31 दिसंबर 2008 को नोटिस जारी कर, विदेशी बैंकों में जमा रकम का खुलासा नहीं करने के आरोप में 40 हजार करोड़ रुपये बतौर टैक्स की मांग की थी...लेकिन ये मांग सिर्फ नोटिस तक ही सीमित रही....पैसे वसूलने के लिए कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई...कोई कार्रवाई नहीं की गई....कभी कभी छापेमारी का दौर चलता रहा...लेकिन बात इससे आगे नहीं बढ़ी....कहा गया कि वो देश से फरार हो चुका है....लेकिन कहने वाले कहते रहे...देखने वाले देखते रहे...कि इस दौरान हसन अली भारत में ही मौजूद रहा....इनकम टैक्स के समन जारी करने के बाद हसन अली आईटी के सामने पिछले महीने के 18 तारीख को पेश हुआ...पूछताछ हुई लेकिन गिरफ्तारी नहीं की गई...जाहिर है सरकार इस मामले में ढीला रवैया अपनाती रही है....आखिरकार सरकार के इस रवैये से तंग आकर सुप्रीम कोर्ट को ही आगे आना पड़ा...इस मसले पर 3 मार्च यानी गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को तगड़ी फटकार लगाई...और सरकार से सवाल पूछा कि आखिर किन वजहों से हसन अली को गिरफ्तार नहीं किया गया....और क्या आजादी सिर्फ ऐसे ही लोगों के लिए है....इसी तरह सीवीसी पीजे थॉमस की नियुक्ति को अवैध ठहराकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर सवालिया निशान लगा दिया....सवाल उठता है...कि क्या सरकार को उसकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाने के लिए अदालतों को ही आगे आना पड़ेगा....क्या सरकार का काम सिर्फ शासन करना भर रह गया है....जिस काम को सरकार को करना चाहिए था...उस काम को अदालतें करेंगी....अब तो लोग सरकार से उम्मीदें कम....अदालतों से ज्यादा करने लगे हैं....आखिर ऐसा क्यों 

Wednesday, March 2, 2011

अमेरिका में दाडी यात्रा-2

12 मार्च 1930...भारतीय इतिहास का यादगार दिन.....इसी दिन महात्मा गांधी ने मात्र 78 स्वयंसेवकों के साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा शुरु की थी....शुरुआती दौर में ब्रिटिश हुकुमत के लिए भले ही ये पहले लगी हो....कि जिस यात्रा का अंत सिर्फ नमक बना कर खत्म होता हो...उससे ब्रिटिश सम्राज्य को क्या खतरा हो सकता है....लेकिन जल्द ही अंग्रेजों को एहसास हो गया कि ये सिर्फ यात्रा ही नहीं....बल्कि एक मुट्ठी नमक बनाकर ब्रिटिश हुकुमत से अंहिसापूर्वक लड़ने के लिए करोड़ों भारतीयों के दिलों में विश्वास पैदा करना भी था....6 अप्रैल 1930 को दांडी यात्रा खत्म होते होते ये यात्रा एक जन आंदोलन का रुप पकड़ चुकी थी....आज दांडी यात्रा का एक बार फिर जिक्र आ रहा है...और इस बार ये जिक्र भारत से नहीं बल्कि एक परायी धरती से निकलकर सामने आ रहा ...वो भी भारत के लिए....अंग्रेजों से लड़ने के लिए नहीं....बल्कि भारत में फैले भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए...जी हां....अमेरिका में अप्रवासी भारतीयों के एक समूह ने अमेरिकी धरती पर एक दांडी यात्रा शुरु करने का फैसला किया है...ये यात्रा भी उसी तारीख से शुरु होगी...जिस दिन महात्मा गांधी ने शुरु किया था...यानी 12 मार्च....दांडी की तरह इस यात्रा में भी 240 मिल पैदल ही दूरी तय की जाएगी....यात्रा की शुरुआत कैलिफोर्निया के सेन डियोगो स्थित मार्टिन लूथर किंग जूनियर मेमोरियल पार्क से होगी.....और लॉस एंजिल्स होते हुए 26 मार्च को सन फ्रांसिस्को स्थित गांधी मूर्ति के पास खत्म होगी....भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु हो रही इस दांडी यात्रा दो में अमेरिका के सभी बड़े शहरों के अप्रवासी भारतीयों के अलावा...भारत के 10 शहरों और दुनिया भर के 8 देशों से लोग हिस्सा लेंगे....इस यात्रा के आयोजकों के मुताबिक दांडी यात्रा दो का मकसद भारत को भ्रष्टाचार से निजात दिलाना है....साथ ही भारत की सरकार को जनलोकपाल बिल और यूनाइटेड नेशन कंन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन का अनुमोदन करना है....इस दांडी यात्रा दो में भारत के कई संगठनों का भरपूर समर्थन मिल रहा है...जिनमें से एंटी करप्शन मूवमेंट के अलावा लोकसत्ता पार्टी, इंडिया अगेंस्ट करप्शन, द फिफ्थ पिलर, यूथ फॉर बेटर इंडिया, साकू और सेव इंडिया करप्शन शामिल है

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